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पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर भारत में आम जीआई कैंसर में से एक है। लगभग 95% पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर ऐडनोकार्सिनोमा होते हैं, और वे पैंक्रिया (अग्न्याशय) की एक्सोक्राइन सेल्स (कोशिकाओं) से उत्पन्न होते हैं।
पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर एक प्रकार का गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर है जो असामान्य सेल्स (कोशिकाओं) के अनियंत्रित विभाजन के कारण होता है। एक्सोक्राइन और एन्डोक्राइन सेल्स (कोशिकाओं) से पैंक्रिया (अग्न्याशय) बनता हैं, और ज्यादातर मामलों में, पैंक्रियाटिक कैंसर एक्सोक्राइन सेल्स (कोशिकाओं) से उत्पन्न होते हैं।
आमतौर पर पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के कारण पेट दर्द, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, पीलिया और अचानक वजन घटना यह सब होता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आमतौर पर पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के लक्षण बीमारी के उन्नत चरणों तक दिखाई नहीं देते हैं।
जिस प्रकार की सेल्स (कोशिकाओं) से वे उत्पन्न होते हैं, उसके आधार पर पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
लगभग 95% पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर एडेनोकार्सिनोमा होते है, और ये पैंक्रिया (अग्न्याशय) की एक्सोक्राइन सेल्स (कोशिकाओं) से उत्पन्न होते हैं।
न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर आइलेट सेल्स (कोशिकाओं) से उत्पन्न होते हैं और पैंक्रिया (अग्न्याशय) के कैंसर के छोटे प्रतिशत के लिए जिम्मेदार होते हैं। एचसीजी में भारत के सर्वश्रेष्ठ पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर विशेषज्ञ हैं, जिन्हें अनुकूलित और परिणाम-उन्मुख उपचार योजनाओं के साथ पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का इलाज करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे सकारात्मक नैदानिक परिणाम सामने आते हैं।
आमतौर पर प्रारंभिक चरण के पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर पर किसी का ध्यान नहीं जाता है, और बाद में लक्षण अक्सर अस्पष्ट और विशिष्ट नहीं होते हैं। इस वजह से, अक्सर उन्नत चरणों में विकसित होने के बाद पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का पता चलता हैं। पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के मुख्य लक्षणों में शामिल हैं :
हालांकि पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का सटीक कारण अज्ञात है, विभिन्न जोखिम कारकों की पहचान की गई है जो किसी के पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर जोखिम को बढ़ा सकते हैं :
पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन यह 50 से 80 साल की उम्र के बीच सबसे आम है। लगभग 63% पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के मरीज़ 70 साल से अधिक उम्र के होते हैं।
पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के सभी मामलों में से एक तिहाई मामलों में धूम्रपान का कारण पाया गया है। किसी भी रूप में तम्बाकू का सेवन करने से पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
जिन लोगों को क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस (दीर्घकालिक अग्नाशय सूजन) है, उनमें पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर होने की संभावना अधिक होती है। आनुवंशिक पैंक्रियाटाइटिस वाले मरीजों में खासकर 40 साल की उम्र के बाद पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के विकास का खतरा बढ़ जाता है।
डॉक्टर पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का पता लगाने और निर्णायक निदान करने के लिए कई परीक्षण हैं जिनकी सिफारिश कर सकते हैं। पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के निदान के लिए आमतौर पर सिफारिश किए जाने वाले परीक्षण निम्नलिखित हैं :
यदि मरीज़ में पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के लक्षण दिखाई देते हैं तो शारीरिक परीक्षण की सिफारिश की जाती है। जांच की शुरुआत डॉक्टर द्वारा मरीज़ के चिकित्सा इतिहास के साथ-साथ किसी भी शारीरिक शिकायत या लक्षण, जैसे कि हाल ही में वजन घटना, दर्द, भूख में परिवर्तन आदि के बारे में पूछताछ के साथ होती है। उसके बाद, डॉक्टर एक पूर्ण शारीरिक परीक्षण करेंगे जिसमें छाती और पेट के क्षेत्र का निरीक्षण करना शामिल होता है।
पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का पता लगाने के लिए रक्त परीक्षण की शायद ही कभी सिफारिश की जाती है। हालांकि, मरीज़ के रक्त में बिलीरुबिन और लिवर (यकृत) एंजाइम के स्तर, जो लिवर (यकृत) और पैंक्रिया (अग्न्याशय) के कामकाज को मापते हैं, यह परीक्षण डॉक्टर के लिए बहुत प्रासंगिक होते हैं। आमतौर पर पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के लिए सीए 19-9 (कार्बोहाइड्रेट एंटीजन 19-9) टेस्ट की सिफारिश की जाती है। सीए 19-9 एक ट्यूमर मार्कर है , यदि कैंसर की उपस्थिती होती है तो इसकी मात्रा बहुत अधिक बढ जाती है। केवल बढ़े हुए सीए 19-9 का स्तर पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के निदान की पुष्टि नहीं कर सकता है। बढा हुआ सीए19-9 का स्तर पैंक्रियाटाइटिस या लिवर (यकृत) सिरोसिस सहित कई अन्य बीमारियों का संकेत दे सकता है। साथ ही, पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर वाले कुछ लोगों में यह मार्कर बिल्कुल नहीं हो सकता है। प्रशासित कैंसर उपचार की प्रभावकारिता का आकलन करने के लिए भी सीए 19-9 परीक्षण किया जाता है।
अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन जैसे इमेजिंग परीक्षण पैंक्रिया (अग्न्याशय) और आस-पास के ऊतकों की विस्तृत छवियां बनाते हैं जो अधिक सटीक निदान और बाद में उपचार योजना बनाने में मदद करते हैं। अन्य इमेजिंग परीक्षण जो विशेष रूप से पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के निदान के लिए उपयोग किए जाते हैं उनमें शामिल हैं :
एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड एक अनोखी परीक्षण प्रक्रिया है जिसका उपयोग पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के निदान के लिए किया जाता है। यह प्रक्रिया डॉक्टर को पैंक्रिया (अग्न्याशय) और लिवर (यकृत) के साथ-साथ अन्ननलिका, पेट और आंत के अग्र भाग को बेहतर ढंग से देखने में सहायता करती है। मरीज़ के सोते समय एक पतली लचीली ट्यूब, जिसे एंडोस्कोप कहा जाता है, उसे मुंह के माध्यम से पेट और छोटी आंत में डाला जाता है। ट्यूब के सीरे पर एक अल्ट्रासाउंड प्रोब जोड़ दिया जाता है, यह प्रोब ध्वनि तरंगों को प्रसारित करता है जो पेट के अंगों की छवियां बनाती हैं। यदि डॉक्टर किसी असामान्य गांठ को नोटिस करते है, तो आगे के मूल्यांकन के लिए उसका एक छोटा सा नमूना इकठ्ठा किया जा सकता है (बायोप्सी)।
इस प्रक्रिया के दौरान, एंडोस्कोप को डॉक्टर द्वारा मरीज़ के पेट और छोटी आंत में निर्देशित किया जाता है। ईआरसीपी दो इमेजिंग तकनीकों को जोड़ती है : आंतरिक संरचनाओं का प्रत्यक्ष दृश्य (एंडोस्कोपी) और लाइव-एक्शन एक्स-रे (फ्लोरोस्कोपी)। डॉक्टर कैंसर के विकास के लिए लिवर (यकृत), गॉल्ब्लैडर (पित्ताशय की थैली) और पैंक्रिया (अग्न्याशय) नलिकाओं की संरचनाओं की जांच करने के लिए इन दो तकनीकों का उपयोग कर सकते हैं।
एमआरसीपी एक नॉन - इनवेसिव (बिना चिरफाड वाली) प्रक्रिया है जो पित्त और पैंक्रिया (अग्न्याशय) की नलिकाओं की विस्तृत छवियां बनाने के लिए रेडियो तरंगों और कंप्यूटर से जुड़े एक मजबूत चुंबक का उपयोग करती है। ये छवियां स्वस्थ और असामान्य ऊतकों के बीच अंतर कर सकती हैं, साथ ही पित्त नलिका की रुकावट को भी दिखा सकती हैं।
बायोप्सी एक ऐसी प्रक्रिया है जो डॉक्टर को ऊतक के एक छोटे से टुकड़े को निकालने और उसकी जांच करने की अनुमति देती है। बायोप्सी नमूना एंडोस्कोपी के दौरान इकठ्ठा किया जा सकता है। बाद में कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) की उपस्थिति के लिए इस नमूने की माइक्रोस्कोप के तहत जांच की जाती है। बायोप्सी एक निश्चित निदान प्राप्त करने में मदद कर सकती है। एचसीजी में, हमारे पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर विशेषज्ञ बेहतर गुणवत्ता की नैदानिक सहायता और अभिनव उपचार दृष्टिकोण के माध्यम से भारत में सर्वोत्तम पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर उपचार प्रदान करने का प्रयास करते हैं।
रोग का चरण, सटीक स्थान, मरीज़ की कुल स्वास्थ्य स्थिति और अंत में, मरीज़ की प्राथमिकताएँ जैसे कई महत्वपूर्ण कारकों पर विचार करने के बाद पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के लिए उपचार की योजना तैयार की जाती है।
निम्नलिखित कुछ उपचार विकल्प हैं जो डॉक्टर पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर प्रबंधन के लिए सुझा सकते हैं :
यदि ट्यूमर केवल पैंक्रिया (अग्न्याशय) तक ही सीमित है तो सर्जरी पर विचार किया जा सकता है। पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के लिए नियोजित दो मुख्य सर्जिकल प्रक्रियाओं में शामिल हैं :
यदि कैंसर पैंक्रिया (अग्न्याशय) के सिर में है, तो डॉक्टर व्हिपल प्रक्रिया की सिफारिश करेंगे। इस प्रक्रिया के दौरान, पैंक्रिया (अग्न्याशय) के सिर, साथ ही छोटी आंत (डूअडीनम), गॉल्ब्लैडर (पित्ताशय की थैली) और पित्त नलिका के एक हिस्से को निकाल दिया जाता है। पेट के कुछ हिस्से को भी निकाला जा सकता है। आखिरकार, पैंक्रिया (अग्न्याशय), पेट और आंतों के शेष घटक पाचन की सुविधा के लिए जोड़े जाते हैं।
डिस्टल पैंक्रियाटेक्टोमी एक सर्जरी होती है जो पैंक्रिया (अग्न्याशय) की पूंछ या पूंछ और पैंक्रिया (अग्न्याशय) के शरीर के एक छोटे हिस्से को निकाल देती है। स्प्लीन (स्प्लिहा) को भी निकाला जा सकता है।
कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को मारने के लिए, रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) एक्स-रे और प्रोटॉन जैसे हाई – एनर्जी बीम (उच्च-ऊर्जा किरणों) का उपयोग करती है। कैंसर सर्जरी से पहले या बाद में, मरीज़ को रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) दि जा सकते हैं, जिन्हें अक्सर कीमोथेरेपी के साथ संयोजित किया जाता है। जब सर्जरी किसी विशेष मामले के लिए व्यवहार्य उपचार विकल्प नहीं है तब इस संयोजन का उपयोग किया जा सकता है। कैंसर देखभाल के क्षेत्र में निरंतर प्रगति के माध्यम से, एचसीजी भारत में सबसे अच्छा पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर उपचार प्रदान करने का प्रयास करता है।
कीमोथेरेपी कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए प्रभावशाली कीमो दवाओं का उपयोग करती है। कीमोथेरेपी को नसों के माध्यम से या मौखिक रूप से प्रशासित किया जा सकता है, और इसमें बीमारी के चरण के आधार पर एक केमो दवा या दो या दो से अधिक दवाओं का संयोजन करना शामिल हो सकता है। आमतौर पर जो पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर आसपास के अंगों में फैल गया है उसके इलाज के लिए कीमोरेडिएशन (कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) ) का उपयोग किया जाता है। सर्जरी के बाद, रोग के रिलैप्स (पुनरावर्तन) के जोखिम को कम करने के लिए भी कीमोरेडिएशन दिया जा सकता है।
टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) में ऐसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है जो विशेष रूप से कोशिका की सतह पर मौजूद विशिष्ट प्रोटीन, कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) द्वारा जारी विशिष्ट बायोमार्कर, ट्यूमर वातावरण कारकों आदि के आधार पर कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को लक्षित करती हैं। टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को पनपने और बढ़ने के लिए ट्रिगर करने वाले संकेतों को अवरुद्ध करके काम कर सकती हैं। उन्नत चरणों के पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के लिए, कीमोथेरेपी के साथ टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) दी जाती है।
हां, पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का इलाज संभव है। फिर भी, किसी भी अन्य प्रकार के कैंसर की तरह, पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का उनके शुरुआती चरणों में पता लगाना महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती पहचान उपचार के बाद के नैदानिक परिणामों और जीवन की गुणवत्ता को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
आज, पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के लिए उपचार के कई विकल्प उपलब्ध हैं। एचसीजी में, हमारे पास सर्वश्रेष्ठ पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर विशेषज्ञ हैं, जो परिणाम-उन्मुख उपचार दृष्टिकोणों के साथ प्रारंभिक चरण के और उन्नत चरण के दोनों पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के प्रबंधन में प्रशिक्षित और अनुभवी हैं।
पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर का अक्सर उन्नत चरणों में निदान किया जाता है क्योंकि वे शायद ही कभी लक्षण पैदा करते हैं; सभी पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर में से लगभग आधे मामलों का तब तक पता नहीं चलता जब तक कि वे अन्य अंगों में विकसित नहीं हो जाते।
पैंक्रियाटिक सिस्ट (गांठ) आम हैं, और उनमें से ज्यादातर सिस्ट (गांठ) कैंसरस नहीं होते हैं। हालांकि, कुछ सिस्ट (गांठ) कैंसर पैदा करने वाले होते हैं, और अन्य कैंसर पूर्व होते हैं। पैंक्रियाटिक सिस्ट (गांठ) सौम्य से लेकर घातक तक कई प्रकार के आकार और रुप में होते हैं। आमतौर पर सौम्य सिस्ट (गांठ) बिना किसी चिकित्सकीय उपचार के कुछ समय बाद चले जाते हैं। हालांकि, यदि कोई सिस्ट (गांठ) पाया जाता है, तो सिस्ट (गांठ) का प्रकार सौम्य है या घातक है इसकी पुष्टि करना महत्वपूर्ण है - और यदि आवश्यक हो तो उचित देखभाल करना भी आवश्यक है।
जैसा कि बहुत से लोग जानते हैं, बीआरसीए म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) ब्रेस्ट (स्तन) कैंसर और ओवेरीअन (डिम्बग्रंथि) कैंसर के गठन से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। ये बीआरसीए म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) पैंक्रियाटिक (अग्न्याशय) कैंसर से भी जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। बीआरसीए म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के खतरे को लगभग दोगुना कर देता है। पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर वाले लगभग 5% लोगों में बीआरसीए म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) पाए जाते हैं।
हालांकि अधिकांश पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर को रोका नहीं जा सकता है, आप अपना वजन कम करके, धूम्रपान छोड़कर और शराब के सेवन को कम करके अपने जोखिम को कम कर सकते हैं। क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस (दीर्घकालिक अग्नाशय सूजन) और इस बीमारी का सकारात्मक पारिवारिक इतिहास यह भी अन्य जोखिम कारक हैं। प्रीकैंसरस घावों का समय-समय पर पता लगाया जा सकता है और, यदि उन्हें समय पर संबोधित किया जाता है, तो व्यक्ति पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के विकास को रोक सकता है।